Saturday, July 8, 2017

आचार्य विद्यासागर जी का 
कालजयी 'मूकमाटी' महाकाव्य
संघर्ष को हर्ष में बदलने वाला
सकारात्मक दस्तावेज डॉ. चन्द्रकुमार जैन 

राजनांदगांव। आचार्य विद्यासागर जी महाराज के  मूकमाटी महाकाव्य पर बहुप्रशंसित शोध कर पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त राजनांदगांव के दिग्विजय कालेज के हिंदी विभाग के राष्ट्रपति सम्मानित प्राध्यापक डॉ. चन्द्रकुमार जैन का कहना है कि 'मूकमाटी' मानवीय आस्था और मानव-मूल्यों का दस्तावेज़ है। युगीन समस्याओं के समाधान का अचूक स्रोत है। वह अध्यात्म व काव्य और काव्य व मानव-धर्म के अभेद की उद्घोषिका है। डॉ. जैन कहते हैं कि 'कामायनी' में जयशंकर प्रसाद जी ने जिस प्रकार मानवता के स्वर फूंके हैं, संत-कवि आचार्य विद्यासागर जी महाराज ने 'मूकमाटी' में आतंकवाद के अंत व अनन्तवाद के श्रीगणेश से मानवता की जीत का मंगल गान रचा है ।

आचार्य प्रवर के संयम स्वर्ण महोत्सव पर डॉ. जैन ने कहा कि 'मूकमाटी' उनके जीवन का अब तक का सार सृजन है। कवि की भावना सर्व मंगल की कामना के रूप में अभिव्यक्त हुई है। 'सब की जीवन लता हरित भरित विहंसित' होने का भाव स्वयं भारतीय संस्कृति की विशेषता है। 'मूकमाटी' में माटी का मौन ही जैसे सब कुछ कहता चलता है। वहीं, अंततः वह लौकिक,आध्यात्मिक और दार्शनिक-नीतियों का त्रिवेणी संगम सिद्ध होती है। डॉ. जैन कहते हैं कि वस्तुतः आचार्य श्री का यह कालजयी महाकाव्य सार्थक पुरुषार्थ की चरम उपलब्धि का मंगल कलश है। 

चर्चा के दौरान प्रोफ़ेसर चंद्रकुमार जैन ने बताया कि आचार्य प्रवर का मूकमाटी महाकाव्य हिंदी साहित्य ही नहीं, विश्व साहित्य की अभूतपूर्व उपलब्धि है। यह आधुनिक हिंदी काव्य संसार का भी गौरव ग्रन्थ है। इसका पूरा परिवेश मानवतामय है। संयम,समन्वय और सामंजस्य इस ग्रन्थ की आवाज़ है। मूकमाटी  दरअसल आत्म विकास के संघर्ष को हर्ष में बदलने वाला अक्षर-अक्षर सकारात्मक दस्तावेज है। मानव सेवा, करुणा, दया, अहिंसा के मूल्य इस महाकाव्य को आधुनिक सन्दर्भों में प्रासंगिक बनाते हैं।मुकमाटी को सिर्फ पढ़ना पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे एक महान तपस्वी, महायोगी, संत कवि की आत्मा के संगीत के रूप में सुनना चाहिए। 

डॉ. जैन आगे मर्म भरे शब्दों में कहते हैं - माटी जैसे सबके जीवन से जुड़ी है, वैसे आचार्य विद्यासागर जी का जीवन और सृजन भी सब के लिए है। मूकमाटी के अभुदय और विकास की कहानी है। आदमी के एक अदद इंसान बन जाने की दास्तान है। मूकमाटी महाकाव्य एक कृति मात्र नहीं, व्यक्तित्व के पूर्ण रूपांतरण का राजमार्ग है। डॉ. जैन ने मूकमाटी  का यह अंश साझा करते हुए कहा कि जीवन निर्माण में व्यक्ति के दो रूप इस तरह सामने आते हैं -

इस युग के / दो मानव / अपने आप को / खोना चाहते हैं / एक भोग-राग / मद्यपान को चुनता है / और एक तप-त्याग को / आत्मध्यान को धुनता है / कुछ ही क्षणों में / दोनों होते / विकल्पों से मुक्त / फिर क्या कहना / एक शव के समान / निरा पड़ा है / और एक / शिव के समान खरा उतरा है। 

Thursday, April 27, 2017

रामकथा के विश्व शोध शिल्पी : फादर कामिल बुल्के 

 डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

भारत का गौरवपूर्ण इतिहास जिन ग्रंथों में आज भी सुरक्षित है, उनमें रामायण और महाभारत मुख्य हैं। जितना प्राचीन यह देश है उतना ही प्राचीन और विस्तृत इस देश का साहित्य और यहाँ का सांस्कृतिक वैभव है। सहज भाव से समझा जा सकता है कि जिन दो महापुरुषों के जीवन ने भारत के इतिहास, संस्कृति, साहित्य और उसकी परम्पराओं को सबसे अधिक प्रभावित किया है, वे थे मर्यादा पुरुषोत्तम राम और योगेश्वर कृष्ण। 

श्रीराम को माध्यम बनाकर रचा गया भारतीय साहित्य तो विशाल है ही, विदेशी साहित्य का भी अलग महत्त्व है। उस सबका उपजीव्य है महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण। इस प्रकार  रामकथा भारत ही नहीं, विश्व साहित्य की धरोहर है। यही कारण है कि रामायण और रामचरित की गणना विश्व स्तर पर साहित्य के अतुल्य सारस्वत-गौरव के रूप में की जाती है। रामकथा का विस्तार रामायण से लेकर महाभारत तक, अचंभित कर देने वाले वैशिष्ट्य के साथ विद्यमान है। बौद्ध साहित्य में भी रामकथा का वर्णन मिलता है। विविध भारतीय भाषाओं यथा मराठी, तेलगू, हिंदी, बँगला, उड़िया आदि में भी रामकथा लिखी गई है। सर्व विदित है कि गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस का विशेष स्थान है। श्री विद्यानंद सरस्वती ठीक ही लिखते हैं - " रामकथा की लोकप्रियता का श्रेय, उतना उसके लेखकों को नहीं, जितना स्वयं राम को है। राम का नाम प्रत्येक भारतीय के मन में ओत-प्रोत है।" राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने तो जैसे घोषित ही कर दिया - 

राम तुम्हारा वृत्त स्वयं ही काव्य है 
कोई कवि बन जाए सहज सम्भाव्य है 

विदेशों में भी रामकथा के लेखक और अध्येता रहे हैं और अब भी हैं, किन्तु उनमें जिस राममय जीवन के धनी विद्वान का नाम अत्यंत सम्मानपूर्वक लिया जाता है, वे हैं फादर कामिल बुल्के, जिनके लिए राम के प्रभाव से ही, रामकथा का लेखक होना भी जैसे सहज सम्भाव्य था। उन्होंने उससे भी आगे असंभव को भी संभव कर दिखाया। क्योंकि पुराने समय में भारत यात्रा पर आये विश्व के अनेक विद्वानों में फादर कामिल बुल्के ही ऐसे थे जो भारत आए तो यहीं के हो गए और हिन्दी के लिए वह काम कर गए, जो शायद तब कोई भारतीय भी नहीं कर सकता था।  डॉ कामिल बुल्के बेल्जियम से आये और भारत में कार्य करना उन्हें इतना प्रेरणादायक लगा कि वे भारत में ही बस गए। स्मरणीय है कि आरंभिक जीवन में उन्होंने दार्जिलिंग के एक स्कूल में गणित पढ़ाते हुए खड़ी बोली, ब्रज और अवधी सीखी। सन् 1938 में सीतागढ़, हजारीबाग में पंडित बदरीदत्त शास्त्री से हिंदी और संस्कृत सीखी। सन् 1940 में प्रयाग से विशारद की परीक्षा पास की और फिर सन् 1942-44 में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए किया।

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डॉ. बुल्के ने लिखा है,''मैं जब 1935 में भारत आया तो अचंभित और दुखी हुआ। मैंने महसूस किया कि यहाँ पर बहुत से पढ़े-लिखे लोग भी अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति जागरूक नहीं हैं। यह भी देखा कि लोग अँगरेजी बोलकर गर्व का अनुभव करते हैं। तब मैंने निश्चय किया कि आम लोगों की इस भाषा में महारत हासिल करूँगा।'' उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से संस्कृत में मास्टर्स डिग्री हासिल की।भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के अध्ययन की गहनता को और अधिक गहनतम करने के लिए उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सन् 1949 में ‘रामकथा’ पर डी.फिल. किया। बाद में तुलसी दास के रामचरित मानस का गहन अध्ययन कर, सन् 1950 में उन्होंने ‘राम कथा की उत्पत्ति और विकास’ पर पी.एचडी. की। 

डॉ. कामिल बुल्के कभी-कभी धार्मिक ग्रंथों का गहराई से अध्ययन के लिए दार्जीलिंग में रुकते थे। उनके पास दर्शन का गहरा ज्ञान तो था, लेकिन वे भारतीय दर्शन और साहित्य का व्यवस्थित अध्ययन करना चाहते थे। इसी दौरान उनका साक्षात्कार तुलसीदास की रामचरित मानस से हुआ। रामचरित मानस ने उन्हें बहुत अधिक प्रभावित किया। उन्होंने इसका गहराई से अध्ययन किया। इस ग्रंथ की अनिर्वचनीय काव्यात्मक उत्कृष्टता के कारण वे इस ग्रंथ की पूजा करने लगे। उन्हें इसमें नैतिक और व्यावहारिक बातों का चित्ताकर्षक समन्वय देखने को मिला। उनकी यह थीसिस भारत सहित पूरे विश्व में प्रकाशित हुई जिसके बाद सारी दुनिया बुल्के को जानने लगी। 

जिस समय फादर बुल्के इलाहाबाद में शोध कर रहे थे, उस समय यह नियम था कि सभी विषयों में शोध प्रबंध केवल अँगरेजी में ही प्रस्तुत किए जा सकते हैं। फादर बुल्के के लिए अँगरेजी में यह कार्य अधिक आसान होता पर यह उनके हिन्दी स्वाभिमान के खिलाफ था। उन्होंने आग्रह किया कि उन्हें हिन्दी में शोध प्रबंध प्रस्तुत करने की अनुमति दी जाए। इसके लिए शोध संबंधी नियमावली में परिवर्तन किया गया। वे ‘यामिनी’ और ‘दीप शिखा’ की रचयिता कवयित्री ‘महादेवी वर्मा’ का इसीलिए विशेष आदर करते थे क्योंकि वे अंग्रेजी में प्रवीण होते हुए भी, उनसे सदा अपनी मातृ भाषा में संवाद करती थीं। महादेवी वर्मा पर एक संस्मरण लिखते हुए डा. कामिल बुल्के एक जगह कहते हैं, ‘‘अंग्रेजी भाषा के कारण ही राजनीतिक परतंत्रता के साथ भारतीयों में मानसिक दासता भी आ गई है।’’  

प्राचीन भारत के समान ही आधुनिक यूरोप ज्ञान सम्बन्धी खोज के क्षेत्र में अग्रसर रहा है। यूरोपीय विद्वान ज्ञान तथा विज्ञान के रहस्यों के उद्घाटन में निरंतर यत्नशील रहे हैं। उनकी इस खोज क्षेत्र यूरोप तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि संसार के समस्त भागों पर उनकी दृष्टि पड़ी। इस महत्त्वपूर्ण ग्रंथ के लेखक फादर बुल्के को हम इन्हीं विद्याव्यसनी यूरोपीय अन्वेषकों की श्रेणी में रख सकते हैं। भारतीय विचारधारा समझने के लिए इन्होंने संस्कृत तथा हिन्दी भाषा और साहित्य का पूर्ण परिश्रम के साथ अध्ययन किया। उनकी रामकथा की बड़ी विशिष्ट यह है कि उन्होंने रामकथा से सम्बन्ध रखने वाली किसी भी सामग्री को छोड़ा नहीं है।
 
डॉ. कामिल बुल्के का ग्रन्थ ग्रंथ चार भागों में विभक्त है। प्रथम भाग में ‘प्राचीन रामकथा साहित्य’ का विवेचन है। इसके अन्तर्गत पाँच अध्यायों में वैदिक साहित्य और रामकथा, वाल्मीकिकृत रामायण, महाभारत की रामकथा, बौद्ध रामकथा तथा जैन रामकथा संबंधी सामग्री की पूर्ण परीक्षा की गई है। द्वितीय भाग का संबंध रामकथा की उत्पत्ति से है और इसके चार अध्यायों में दशरथ जातक की समस्या, रामकथा के मूल स्रोत के सम्बन्ध में विद्वानों के मत, प्रचलित वाल्मीकीय रामायण के मुख्य प्रक्षेपों तथा रामकथा के प्रारंभिक विकास पर विचार किया गया है। ग्रंथ के तृतीय भाग में ‘अर्वाचीन रामकथा साहित्य का सिंहावलोकन’ है। इसमें भी चार अध्याय हैं। पहले और दूसरे अध्याय में संस्कृत के धार्मिक तथा ललित साहित्य में पाई जाने वाली रामकथा सम्बन्धी सामग्री की परीक्षा है। तीसरे अध्याय में आधुनिक भारतीय भाषाओं के रामकथा सम्बन्धी साहित्य का विवेचन है। इससे हिंदी के अतिरिक्त तमिल, तेलुगु, मलायालम, कन्नड़, बंगाली, काश्मीरी, सिंहली आदि समस्त भाषाओं के साहित्य की छान-बीन की गई है। चौथे अध्याय में विदेश में पाये जाने वाले रामकथा के रूप में सार दिया गया है और इस सम्बन्ध में तिब्बत, खोतान, हिंदेशिया, हिंदचीन, श्याम, ब्रह्मदेश आदि में उपलब्ध सामग्री का पूर्ण परिचय एक ही स्थान पर मिल जाता है। अंतिम तथा चतुर्थ भाग में रामकथा सम्बन्धी एक-एक घटना को लेकर उसका पृथक-पृथक विकास दिखलाया गया है। घटनाएँ कांडक्रम से ली गई हैं अतः यह भाग सात कांडों के अनुसार सात अध्यायों में विभक्त है। उपसंगार में रामकथा की व्यापकता, विभिन्न रामकथाओं की मौलिक एकता, प्रक्षिप्त सामग्री की सामान्य विशेषताएँ, विविध प्रभाव तथा विकास का सिंहावलोकन है। 

डॉ. धीरेन्द्र शर्मा के मतानुसार " यह ग्रंथ वास्तव में रामकथा सम्बन्धी समस्त सामग्री का विश्वकोष कहा जा सकता है। सामग्री की पूर्णता के अतिरिक्त विद्वान लेखक ने अन्य विद्वानों के मत की यथास्थान परीक्षा की है तथा कथा के विकास के सम्बन्ध में अपना तर्कपूर्ण मत भी दिया है। वास्तव में यह खोजपूर्ण रचना अपने ढंग की पहली ही है और अनूठी भी है। हिन्दी क्या किसी भी यूरोपीय अथवा भारतीय भाषा में इस प्रकार का कोई दूसरा अध्ययन उपलब्ध नहीं है। अतः हिंदी में इस लोकप्रिय विषय पर ऐसे वैज्ञानिक अन्वेषण के प्रस्तुत करने के लिए विद्वान लेखक बधाई के पात्र हैं।" 

उल्लेखनीय है कि रामकथा की अद्वितीय व्यापकता हमारे सांस्कृतिक इतिहास का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। इसे डॉ. बुल्के ने गहराई से समझा ही नहीं, आत्मसात भी किया। उन्होंने स्वयं लिखा - " राम-भक्ति के पल्लवित होने के साथ-साथ रामकथा का विकास अपनी अंतिम परिणति पर पहुँच गया था। अतः पन्द्रहवीं शताब्दी के बाद के संस्कृत साहित्य का पूरा निरूपण अनावश्यक था। इसी प्रकार आधुनिक आर्य भाषाओं का रामकथा साहित्य प्रस्तुत निबन्ध के दृष्टिकोण से अपेक्षाकृत कम महत्त्व रखता है। वास्तव में यह साहित्य प्रधानता रामकथा न होकर राम साहित्य सिद्ध होता है। इसका ‘विशेषकर हिन्दी राम-साहित्य का) समुचित अध्ययन राम-भक्ति की उत्पत्ति और विकास के पूरे विश्लेषण के पश्चात् ही संभव हो सकेगा।"  

डा. कामिल बुल्के लैटिन, ग्रीक, फ्रेंच , फ्लेमिश , अंग्रेजी, हिंदी, संस्कृत जैसी विश्व की कई भाषाओं के ज्ञाता थे। गहन खोज, शोध, अध्ययन और मीमांसा आदि उनकी विशेषताएं थीं। डा. कामिल बुल्के एक लंबे समय तक रांची के सेंट जेवियर्स कालेज में संस्कृत तथा हिंदी के विभागाध्यक्ष रहे। डा.बुल्के का अपने समय के हिंदी भाषा के सभी चोटी के विद्वानों से संपर्क था। डा. धर्मवीर भारती, डा. जगदीश गुप्त, डा. रामस्वरूप, डा. रघुवंश, महादेवी वर्मा आदि से उनका विचार-विमर्श और संवाद होता रहता था। महादेवी वर्मा को वे बहन मानते थे। बुल्के जी अपने समय के प्रति सजग एवं सचेत थे। गोस्वामी तुलसीदास की राम भक्ति के सात्विक और आध्यात्मिक आयाम के प्रति उनके मन में बहुत आदर था। उनका कहना था, ‘‘जब मैं अपने जीवन पर विचार करता हूं, तो मुझे लगता है ईसा, हिंदी और तुलसीदास- ये वास्तव में मेरी साधना के तीन प्रमुख घटक हैं और मेरे लिए इन तीन तत्वों में कोई विरोध नहीं है, बल्कि गहरा संबंध है।  जहां तक विद्या तथा आस्था के पारस्परिक संबंध का प्रश्न है, तो मैं उन तीनों में कोई विरोध नहीं पाता। मैं तो समझता हूं कि भौतिकतावाद, मानव जीवन की समस्या का हल करने में असमर्थ है। मैं यह भी मानता हूं कि ‘धार्मिक विश्वास’ तर्क-वितर्क का विषय नहीं है।’

डा. कामिल बुल्के का कहना था कि कला और साहित्य मानव जाति की गहन उपलब्धियां हैं, मनुष्य की उच्च कल्पनाएं तथा गहरी अनुभूतियां उनमें अभिव्यक्त होती हैं। सन् 1950 में उन्होंने खुद को और अधिक परिमार्जित एवं परिष्कृत करने के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ‘राम कथा उत्पत्ति और विकास’ पर शोध किया। 600 पृष्ठों में लिखा गया यह शोधग्रंथ चार भागों में विभक्त है। हिंदी भाषा-साहित्य पर काम करते-करते हिंदी भाषा की शब्द-संपदा से डा. कामिल बुल्के कुछ इस तरह प्रभावित हुए कि उन्होंने एक शब्दकोश ही बना डाला। इस शब्दकोश का इतना स्वागत हुआ कि बाद में उन्होंने अथक परिश्रम कर एक ‘संपूर्ण अंग्रेजी-हिंदी’ कोश बनाया जो आज भी हिंदी भाषा का प्रामाणिक शब्दकोश माना जाता है।

यू.के. की हिंदी लेखिका उषा राजे सक्सेना के अनुसार "डा. कामिल बुल्के का कहना था कि कला और साहित्य मानव जाति की गहन उपलब्धियां हैं, मनुष्य की उच्च कल्पनाएं तथा गहरी अनुभूतियां उनमें अभिव्यक्त होती हैं- इसलिए आस्तिक भी उन्हें मानव जीवन के उद्देश्य से अलग नहीं कर सकता। डा. कामिल बुल्के मानते हैं कि सृष्टि, कला और साहित्य का लक्ष्य सौंदर्य है, किंतु यह सीमित नहीं बल्कि अनंत है।"

‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्
तस्य भाषा सर्वमिदमं विभाति’

उन्होंने कठोपनिषद से उपरोक्त संदर्भ लेते हुए अपनी जीवनी में एक स्थान पर लिखा है, ‘‘मनुष्य के हृदय में उस अनंत सौंदर्य की अभिलाषा बनी रहती है और इस कारण वह उसके प्रतिबिम्ब के प्रति, सीमित सौंदर्य के प्रति अनिवार्य रूप से आकर्षित हो जाता है। कलाकार तथा साहित्यकार को मनुष्य की इस स्वाभाविक सौंदर्य-पिपासा को बनाए रखना तथा इसका उदारीकरण करना चाहिए, उसी में उसकी कला की सार्थकता है।’’ इस कसौटी पर तुलसीदास का साहित्य खरा उतरता है। तुलसीदास मानस को ‘स्वांतः सुखाय’ रघुनाथ गाथा मानते हैं किंतु ‘कला, कला के लिए’ आदि कला की उद्देश्यहीनता विषयक सिद्धांत उनके
मानस से कोसों दूर हैं। उनकी धारणा है कि

‘‘कीरति भनति भूति भलि सोई
सुरसरि सम सब कर हित होई’’

कामिल बुल्के का कहना था, ‘‘तुलसीदास के कारण मैंने वर्षों तक राम कथा साहित्य का अध्ययन किया है। लोक संग्रह उस महान् साहित्यिक परंपरा की एक प्रमुख विशेषता है और उस दृष्टि से तुलसीदास रामकथा-परंपरा के सर्वोत्तम प्रतिनिधि हैं। उन्होंने रामचरित के माध्यम से जिस भक्ति-मार्ग का प्रतिपादन किया है, उसमें नैतिकता तथा भक्ति के अनिवार्य संबंध पर बहुत बल दिया है।’’ अपनी और तुलसी की तुलना करते हुए डा. कामिल लिखते हैं, ‘‘तुलसी के इष्देव राम हैं और मैं ईसा को अपना इष्देव मानता हूं, फिर दोनों के भक्तिभाव में बहुत कुछ समानता पाता हूं। अंतर अवश्य है- इसका एक कारण यह भी है कि मुझमें तुलसी की चातक टेक का अभाव है।’’

पुनः उषा राजे सक्सेना के शब्दों में "वस्तुतः देखा जाए तो डा. कामिल बुल्के में भी तुलसी जैसा ही भक्ति-भाव है, प्रेम है, विनती है, समर्पण है। दोनों एक ही भक्ति-भाव और एक ही भातृ-भाव से जुड़े हए हैं। डा. कामिल बुल्के का कहना है कि मनुष्य ईश्वर का प्रतिरूप है। यदि हम मनुष्य को प्यार नहीं कर सकते तो हम ईश्वर को भी प्यार नहीं कर सकते हैं। हिंदी भाषा और साहित्य सदा डा. बुल्के का आभारी रहेगा। 
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हिन्दी विभाग, शासकीय दिग्विजय स्नातकोत्तर 
स्वशासी महाविद्यालय, 
राजनांदगाँव ( छत्तीसगढ़ ) 
Mo.9301054300

Sunday, March 26, 2017

रिंदों के लिए शहरों में पानी कौन रखता है ? 

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

आज दुनिया 
पानी की समस्याओं के रूबरू है। 
दिन-प्रतिदिन विकट होते जा रहे 
जल संकट से मुक्ति की पुकार 
सब तरफ सुनी जा सकती है। 
पानी पर बात करने तो सभी तैयार हैं,
किन्तु पानी बचानेऔर उसका 
सही प्रबंधन करने के प्रश्न पर 
सीधी भागीदारी की बात जब आती है 
तब लोग किनारा कर जाते हैं !

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सब जानते हैं कि जल जीवन का पर्याय है, पर उसी जल के जीवन के लिए सार्थक हस्तक्षेप से जी चुराने की आदत से बाज़ नहीं आते हैं। हम मानते हैं जरूर कि जल के बिना जीवन की कल्पना अधूरी है,  हम जानते हैं कि जल हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका इस्तेमाल करते वक्त हम यह भूल जाते हैं कि बेतरतीब इस्तेमाल का बेइन्तिहां हक़ हमें किसी ने नहीं दिया है। हम जल का दोहन करना तो जानते  है, किन्तु उसके संरक्षण में हमारी रूचि जवाब देने लगती है। हम यह भी जानते हैं कि कुछ घंटे या कुछ दिनों तक भूखे तो रहा जा सकता सकता है, पर पानी पिए बगैर कुछ दिनों के बाद जीना भी मुमकिन नहीं है। फिर भी, अफ़सोस की बात है कि हम जल से जग के नाते की उपेक्षा करने के आदी हो गए हैं। 

अब समय की मांग है कि जल संसाधनों के प्रबंधन को हमें निजी जीवन ही नहीं, सामाजिक सरोकार से जोड़कर आगे कदम बढ़ाना चाहिए तथा इसके लिए स्थायी तरीके खोजना चाहिए. वहीं स्थायी जल प्रबंधन की रणनीति में भारत की युवा शक्ति का समुचित निवेश करना होगा। इधर यह खबर भी हौसला बढ़ने वाली है कि जल प्रबंधन पर शोध के लिए होनहार युवक पीयूष रंजन का चयन टेनसिस टेक्नोलॉजी विश्वविद्यालय कुकवैली अमेरिका में किया गया है। जहां पर दो वर्ष तक पीयूष द्वारा शोध कार्य किया जाएगा। शोध कार्य हेतु विश्वविद्यालय द्वारा प्रतिमाह 12 सौ डॉलर दिया जाएगा। विदित हो कि पटना जिले के मरांची गांव निवासी पीयूष रंजन राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित है। यहां इस उपलब्धि के उल्लेख का तात्पर्य यह है कि हमारे युवाओं में योग्यता, लगन, जूनून, जज़्बा सब कुछ है, जिनका इस्तेमाल पानी के सवालों के हल में सही ढंग से सही समय पर किया जाये तो बात बन जाये। 

कौन नहीं जनता कि पानी प्रकृति की सबसे अनमोल धरोहर है। वह विश्व सृजन और उसके संचालन का आधार है। मानव संस्कृति का उद्गाता है।  मानव सभ्यता का निर्माता है। पानी जीवन के लिए अनिवार्य है। पानी के बिना जीव जगत के अस्तित्व और साँसों के सफर की कल्पना बेकार है। फिर भी सभी लोगों को पीने के लिए साफ पानी नहीं मिल पाता है। खेती किसानी की आशाएं पानी के आभाव में धूमिल हो जाती हैं। नदियों को कलकल निनाद कब अवसाद में बदल जाएगा कोई नहीं जनता। जलाशयों को जीवन कब ठहर जाएगा, कह पाना मुश्किल है। पानी न मिलेगा तो परिंदों की उड़ान पर भी सवालिया निशान लग जायेगा। वैसे भी,उड़ान के लिए पानी रखने की जरूरत को हम भुला बैठे हैं। कहा गया है न कि -

नए कमरों में अब चीज़ें पुरानी कौन रखता है 
परिंदों के लिए शहरों में पानी कौन रखता है। 
हमीं गिरती हुई दीवार को थामे रहे वरना 
सलीके से बुज़ुर्गों की निशानी कौन रखता है। 

इसलिए ,अब युवा शक्ति की लोकतान्त्रिक पहचान पानी से जुड़ी हमारी आन-बान -शान के आसपास ही मिल सकती है। जल प्रबंधन और जल संरक्षण के प्रश्न पर युवा पीढ़ी को संजीदा होना पडेगा। उन्हें खुद जागकर लोगों को जगाने का बीड़ा उठाना होगा। जल संकट की भयावहता और जल की महत्ता को लेकर लोगों को जगाने की जिम्मेदारी कोई एक दिन, सप्ताह या माह भर मनाने वाले उत्सव की तरह नहीं बल्कि, हर दिन, पर पल जीकर दिखाने वाली चेतना का ही दूसरा नाम है। 

युवा शक्ति को स्वयंसेवी उद्यम के साथ-साथ रोजगारमूलक अभियानों में नियोजित किया जाना चाहिए ताकि वह जल चेतना के दूत बनकर व्यावहारिक स्तर पर श्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकें। युवा शहरों और गाँवों  में पहुंचकर अच्छी आदतों से पानी की बचत का सार तत्व लोगों तक पहुंचाएं। बताएं कि पानी पर हमारी निर्भरता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है और पानी के स्रोत दिनों-दिन घटते जा रहे हैं। 

हमें पेयजल, दैनिक दिनचर्या, कृषि कार्यों और उद्योग धंधों में पानी की आवश्यकता होती है जिनकी पूर्ति के लिए हम उपलब्ध जल संसाधनों के साथ-साथ भूजल का भी जमकर दोहन कर रहे हैं। लगातार हो रहे दोहन से भूजल का स्तर प्रतिवर्ष नीचे जा रहा है। परिणामस्वरूप जल स्रोत सूखने लगे हैं। जलसंकट गहराने लगा है। वर्षा भूजल स्रोत बढ़ाने का कार्य करती है। भारत में औसतन ग्यारह सौ से बारह सौ मिलीमीटर के आसपास बारिश होती है। अगर हम वर्षा जल का उचित प्रबंधन करें तो यह हमारी आवश्यकताओं के हिसाब से पर्याप्त है बस जरूरत है वर्षा के जल को सहेजने की। वैसे भी पानी कोई समस्या नहीं है बल्कि पानी का भंडारण और पानी को प्रदूषित होने से बचाना एक चुनौती है। 

हमरी युवा पीढ़ी समझे और लोगों को समझाए कि जल पर्यावरण का अभिन्न अंग है। मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है। मानव स्वास्थ्य के लिए स्वच्छ जल का होना नितांत आवश्यक है। जल की अनुपस्थित में मानव कुछ दिन ही जिन्दा रह पाता है क्योंकि मानव शरीर का एक बड़ा हिस्सा जल होता है। अत: स्वच्छ जल के अभाव में किसी प्राणी के जीवन की क्या, किसी सभ्यता की कल्पना, नहीं की जा सकती है। यह सब आज मानव को मालूम होते हुए भी जल को बिना सोचे-विचारे हमारे जल-स्रोतों में ऐसे पदार्थ मिला रहा है जिसके मिलने से जल प्रदूषित हो रहा है। 

जल हमें नदी, तालाब, कुएँ, झील आदि से प्राप्त हो रहा है। जनसंख्या वृद्धि, औद्योगीकरण आदि ने हमारे जल स्रोतों को प्रदूषित किया है जिसका ज्वलंत प्रमाण है कि हमारी पवित्र पावन गंगा नदी जिसका जल कई वर्षों तक रखने पर भी स्वच्छ व निर्मल रहता था लेकिन आज यही पावन नदी गंगा क्या कई नदियाँ व जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं। यदि हमें मानव सभ्यता को जल प्रदूषण के खतरों से बचाना है तो इस प्राकृतिक संसाधन को प्रदूषित होने से रोकना नितांत आवश्यक है वर्ना जल प्रदूषण से होने वाले खतरे मानव सभ्यता के लिए खतरा बन जायेंगे। इसलिए 'बिन पानी सब सून' की सीख की अधिक अनसुनी न करने में ही बुद्धिमानी है। 
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मो 9301054300 

Friday, March 10, 2017

लबहिंयाँ डाले मिलें, 
ग़ालिब अरु घनश्याम 

डॉ. चन्द्रकुमार जैन 

ई उमंग,उल्लास,
प्रेम,सौहार्द की कविता रचता, 
दूरियों का दर्द मिटाता, 
अपनत्व का संगीत छेड़ता 
रंगों में जीवन की कला के चित्र उकेरता 
पर्वों का पर्व  है होली। 

क्यों न हम  होली पर पहले बिहारी के कुछ दोहों के रंग में डूब लें, फिर रच लेंगे होली पर कुछ और शब्द-रास ! तैयार हैं न आप ? अगर हाँ तो पहले गुनगुना लें कि सतसैया के नाविक के तीर वाले कविवर बिहारी फरमाते हैं -

उड़ि गुलाल घूँघर भई तनि रह्यो लाल बितान।
चौरी चारु निकुंजनमें ब्याह फाग सुखदान॥

फूलनके सिर सेहरा, फाग रंग रँगे बेस।
भाँवरही में दौड़ते, लै गति सुलभ सुदेस॥

भीण्यो केसर रंगसूँ लगे अरुन पट पीत।
डालै चाँचा चौकमें गहि बहियाँ दोउ मीत॥

रच्यौ रँगीली रैन में, होरी के बिच ब्याह।
बनी बिहारन रसमयी रसिक बिहारी नाह॥

होली शब्द होला शब्द से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है नई और अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए भगवान की पूजा। होली के त्योहार पर होलिका दहन इंगित करता है कि, जो भगवान के प्रिय लोग है उन्हे पौराणिक चरित्र प्रहलाद की तरह बचा लिया जाएगा, जबकि जो भगवान के लोगों से तंग आ चुके है उन्हे एक दिन पौराणिक चरित्र होलिका की तरह दंडित किया जाएगा ।

होली के त्यौहार को मनाने के कई कारण हैं। यह रंग, स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ, एकता और प्रेम का भव्य उत्सव है। परंपरागत रूप से, यह बुराई की सत्ता पर या बुराई पर अच्छाई की सफलता के रुप मे मनाया जाता है। यह फगवाह के रूप में नामित किया गया है, क्योंकि यह हिन्दी महीने, फाल्गुन में मनाया जाता है।

होली का त्यौहार मनाने के पीछे (भारत में पौराणिक कहानी के) कई ऐतिहासिक महत्व और किंवदंतियों रही हैं। यह कई सालों से मनाया जाने वाला, सबसे पुराने हिंदू त्यौहारों में से एक है। प्राचीन भारतीय मंदिरों की दीवारों पर होली उत्सव से संबंधित विभिन्न अवशेष पाये गये हैं। अहमदनगर चित्रों और मेवाड़ चित्रों में 16 वीं सदी के मध्यकालीन चित्रों की मौजूदा किस्में हैं जो प्राचीन समय के दौरान होली समारोह का प्रतिनिधित्व करती है।

होली का त्योहार प्रत्येक राज्य में अलग-अलग है जैसे देश के कई राज्यों में, होली महोत्सव लगातार तीन दिन के लिए मनाया जाता है जबकि,अन्य विभिन्न राज्यों में यह एक दिन का त्यौहार है। 

लोग पहला दिन होली, घर के अन्य सदस्यों पर रंग का पाउडर बरसाकर मनाते हैं। वे एक थाली में कुछ रंग का पाउडर और पानी से भरे पीतल के बर्तन डालने से समारोह शुरू करते हैं। त्यौहार का दूसरा दिन पुनो कहा गया इसका अर्थ है कि त्यौहार का मुख्य दिन, जब लोग मुहूर्त के अनुसार होलिका का अलाव जलाते है। यह प्रक्रिया बुराई के ऊपर अच्छाई की विजय के उपलक्ष्य में होलिका और प्रहलाद के प्राचीन इतिहास के मिथक के रुप मनाया जाता है। तीसरे दिन का त्योहार पर्व कहलाता है अर्थात् त्योहार का अंतिम दिन, जब लोग अपने घरों से बाहर आते है, एक दूसरे को गले लगाते है, माथे पर गुलाल लगाते है, रंगों से खेलते है, नाचते है, गाते है, एक दूसरे से मिलते है, स्वादिष्ट व्यंजन खाते हैं और बहुत सारी गतिविधियॉ करते है। 

मनुष्य समाज में सामाजिक रूप से प्रचलित प्रत्येक पर्व की एक लम्बी ऐतिहासिक परम्परा विद्यमान है। प्राचीन भारतवर्ष ऋतु-सम्बन्धी उत्सवों को भलीभाँति मनाया करता था। ये उत्सव आज भी यथावत् या स्वरूप में हुए परिवर्तन के साथ मनाए जाते हैं। ऐसा ही एक पर्व, त्यौहार, उत्सव है- होली। होली अपने में मानव सभ्यता की कहानी के सभी रंगों को संजोए हुए है। वास्तव में होली एक अकेला पर्व न होकर एक लम्बे उत्सव के अन्तर्गत होने वाला विनोद था। कौन नहीं जनता कि ’वसन्तोत्सव’ भारत में मनाया जाने वाला बहुत प्रसिद्ध उत्सव था। इस का प्रारम्भ ‘सुवसन्तक’ पर्व से होता था, प्राचीन ग्रन्थ ‘सरस्वतीकण्ठाभरण’ के अनुसार इस दिन पहली बार वसन्त का पृथ्वी पर आगमन होता है। 

तो आइये होली पर कुछ लाज़वाब अंदाज़ वाले दोहों से क्यों न 'होलिया' जाएँ । पेश हैं मेरी पसंद के चुनिंदा दोहे के शब्द रंगकारों की लेखनी पर होली का गुलाल मलते हुए। ये रहे दोहे की दुनिया में होली के रंग - 

कुमार रवीन्द्र क्या खूब लिखते हैं - 

बदल गई घर-घाट की, देखो तो बू-बास।
बाँच रही हैं डालियाँ, रंगों का इतिहास॥

उमगे रँग आकाश में, धरती हुई गुलाल।
उषा सुन्दरी घाट पर, बैठी खोले बाल ॥

हुआ बावरा वक्त यह, सुन चैती के बोल।
पहली-पहली छुवन के, भेद रही रितु खोल ॥

बीते बर्फीले समय, हवा गा रही फाग।
देवा एक अनंग है- रहा देह में जाग॥

फिर भी रवीन्द्र एक सवाल भी कर रहे हैं - 

पर्व हुआ दिन, किन्तु, है, फिर भी वही सवाल।
'होरी के घर' क्यों भला, अब भी वही अकाल॥

लोकेश ‘साहिल' कुछ इस तरह निराले अंदाज़ में आपको होली की लहरों से खेलने आमंत्रित कर रहे हैं -

होली पर साजन दिखे, छूटा मन का धीर।
गोरी के मन-आँगने, उड़ने लगा अबीर॥ 

होली अब के बार की, ऐसी कर दे राम।
गलबहिंया डाले मिलें, ग़ालिब अरु घनश्याम ॥

मनसा-वाचा-कर्मणा, भूल गए सब रीत।
होली के संतूर से, गूँजे ऐसे गीत॥

इक तो वो मादक बदन, दूजे ये बौछार।
क्यों ना चलता साल भर, होली का त्यौहार॥ 

थोड़ी-थोड़ी मस्तियाँ, थोड़ा मान-गुमान।
होली पर 'साहिल' मियाँ, रखना मन का ध्यान ॥

योगराज प्रभाकर कहना चाहते हैं -

नाच उठा आकाश भी, ऐसा उड़ा अबीर।
ताज नशे में झूमता,यमुना जी के तीर ॥
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बरसाने की लाठियाँ, खाते हैं बड़भाग। 
जो पावै सौगात ये, तन मन बागो बाग़ ॥
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तन मन पे यूँ छा गई, होली की तासीर।
राँझे को रँगने चली, ले पिचकारी हीर॥ 

और ये दबंगाई तो देखिये ज़नाब - 

रंग लगावें सालियाँ, बापू भयो जवान। 
हुड़ हुड़ हुड़ करता फिरे, बन दबंग सलमान ॥

समीर लाल 'समीर' की यादें के रंग देखिये - 

होली के हुड़दंग में, नाचे पी कर भाँग।
दिन भर फिर सोते रहे, सब खूँटे पर टाँग ॥

नयन हमारे नम हुए, गाँव आ गया याद।
वो होली की मस्तियाँ,  कीचड़ वाला नाद ॥

महेन्द्र वर्मा को तो होली की मस्ती में पतझड़ की उदासी कुछ इस तरह दिखती है -

निरखत बासंती छटा, फागुन हुआ निहाल।
इतराता सा वह चला, लेकर रंग गुलाल ॥

कलियों के संकोच से, फागुन हुआ अधीर।
वन-उपवन के भाल पर, मलता गया अबीर॥ 

अमराई की छाँव में, फागुन छेड़े गीत।
बेचारे बौरा गए, गात हो गए पीत ॥

फागुन और बसंत मिल, करें हास-परिहास।
उनको हंसता देखकर, पतझर हुआ उदास ॥

और लीजिये, मयंक अवस्थी का होलियाना ऐलान है कि - 

आज अबीर-गुलाल में, हुई मनोरम जंग।
इन्द्रधनुष सा हो गया, युद्धक्षेत्र का रंग ॥
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राजनांदगांव ( छत्तीसगढ़ )
मो.9301054300 
नानाजी देशमुख : 'समाजशिल्पी दंपत्ति' के समर्थ सर्जक

डॉ. चन्द्रकुमार जैन 

मानस के राजहंस डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र हिंदी की वह विरल विभूति हैं जिनकी वाणी ग्राम्य-कुटीर से लेकर राष्ट्रपति भवन तक गूंजी। उनका एक मुक्तक है -

निश्चय समझो जो कभी तुम्हारा बाधक था
वह देख तुम्हारा तेज स्वयं साधक होगा
तुम अपने आदर्शों के आराधक हो लो
पथ स्वयं तुम्हारे पथ का आराधक होगा

इस वर्ष को दो महान विभूतियों के जन्म शताब्दी वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। दोनों का जन्म 1916 में हुआ था। दोनों परम राष्ट्र भक्त हुए। दोनों पर पूरे राष्ट्र को गर्व है। दोनों विभूतियों के संदेशों में राष्ट्रोदय का अद्भुत मर्म हैं। ये विभूतियाँ हैं - एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय और निश्च्छल-निर्मल समाज सचेतक नानाजी देखमुख, जिनके जीवन और दर्शन पर मिश्र जी की उक्त पंक्तियाँ अक्षरशः सटीक प्रतीत होती हैं। 

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साल 2005 में भारत रत्न डॉ. ए.पी.जे.अब्दुल कलाम चित्रकूट आए थे। यहां पर उनका समाजसेवी नानाजी देशमुख आश्रम में आना हुआ, तो वे प्रोटोकॉल तोड़कर सामान्य नागरिकों के साथ पंगत में बैठकर भोजन करने लगे. इस दौरान डॉ. कलाम काफी भावुक हो गए थे क्योंकि उन्हें अपने बचपन की याद आ गई थी। दरअसल चित्रकूट आने पर डॉ. कलाम ने जमीन पर पंगत में ही बैठकर महिला सरपंचों के साथ भोजन किया था। जबकि राष्ट्रपति होने के नाते उनकी भोजन व्यवस्था अलग थी।  तत्कालीन राष्ट्रपति कलाम ने आश्रम के आसपास के गांवों की मुकदमेबाजी से मुक्त व्यवस्था देखी तो कहा कि मुझे रामेश्वरम् में बिताए अपने बचपन की याद आ जाती है। 

उन्होंने बताया कि जब हर दिन नमाज के बाद मेरे पिताजी के पास 10-20 परिवार अपने घर और जमीन की समस्याएं लेकर आते थे। दो-तीन दिन में उन सबको मेरे पिताजी उनकी समस्याओं के बारे में सुझाव व निदान बताया करते थे। हर शुक्रवार को मेरी मां भी मुस्लिम महिलाओं की समस्याएं सुनती थीं औऱ उन्हें निपटाने में मदद करती थीं। मेरे बड़े भाई पंचायती अदालत के प्रमुख थे, लेकिन 70 के दशक के बाद मानवीय स्पर्श से गुंथी ये व्यवस्थाएं खत्म हो गईं और अब ज्यादातर झगड़े अदालतों में जाते हैं. इस परिदृश्य में चित्रकूट के आस-पास के 80 गांवों का झगड़े-मुकदमेबाजी से मुक्त होना एक आदर्श उदाहरण है। दरअसल नाना जी ऐसे ही विराट व्यक्तित्व थे। उन्हें किसी पहचान की दरकार नहीं है। उनकी विलक्षणता और समर्पित सामाजिक सरोकारों ने भारतीय राजनीति को नई दिशा दी है। जन-मन में एक अमिट छाप छोड़ी है। 

एक प्रखर संगठक, लोकप्रिय नेता और ग्रामोदय के प्रति समर्पित समाजसेवी के नाते नानाजी देशमुख अगाध प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं। राजनीति से संन्यास लेने के बाद उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सुदूर ग्रामीण इलाकों और ग्रामीणों के सामाजिक-आर्थिक कल्याण के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया। भोले भले ग्राम्य जनों में नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों का संचार करने का बीड़ा उठाया। ग्रामोदय से भारत के भाग्योदय का सपना देखा। उसे धरातल पर उतार लेन का अभियान चलाया। अधिक उम्र को मार्ग की बढ़ा नहीं बनने दी। सेवा निवृत्त होने की उम्र में अपने जीवन के क्षण-क्षण को सेवा समृद्ध बनाने में जुटे रहे। 

सामाज योद्धा नानाजी ने पहले उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े जिले गोंडा में काम शुरू किया। फिर, सूखा पीडि़त और गरीबी से त्रस्त महाराष्ट्र के बीड जिले को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। अंत में वे उत्तर प्रदेश के चित्रकूट में करीब 500 गांवों में नैतिक मूल्यों के साथ व्यापक सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए वहीं जम गए। चित्रकूट परियोजना संस्थागत विकास और ग्रामीण विकास के एक मॉडल के रूप में अनोखा प्रयास है। इसमें ऐसे विकास पर जोर दिया गया है, जो भारत के लिए सबसे उपयुक्त है। वह जनता की शक्ति पर आश्रित है। उन्होंने सिखाया कि  शोषितों और उपेक्षितों के साथ एक रूप होकर ही प्रशासन और राजकाज का गुर सीखा जा सकता है। यह भी कि युवा पीढ़ी में सामाज निर्माण की चेतना जगाना अनिवार्य है। 

चित्रकूट परियोजना चित्रकूट के आसपास के पांच गांवों के समूह बनाकर सौ गांव समूहों को विकसित करने के लिए तैयार की गई। चित्रकूट परियोजना आत्मनिर्भरता की मिसाल है। इसके तहत गांव के हर व्यक्ति, परिवार और समाज के जीवन के हर पहलू पर गौर किया जाता है। इस मुहिम की कुंजी है समाज शिल्पी दंपती। ये दंपती गांव के ही होते हैं और पांच गांवों के समूह में प्ररेणा देने की जिम्मेदारी निभाते हैं। सबसे पहले इनकी आय वृद्घि पर विचार किया जाता है। इसके लिए जरूरत के मुताबिक जल संचयन और मृदा प्रबंधन की तकनीक अपनाई जाती है। साथ-साथ उद्यम कौशल और स्व-सहायता समूह के जरिए आय बढ़ाने के उपाय अलग होते हैं और ये सभी उपक्रम जुड़े होते हैं। (1) कोई बेकार न रहे (2) कोई गरीब न रहे (3) कोई बीमार न रहे (4) कोई अशिक्षित न रहे (5) हरा-भरा और विवादमुक्त गांव हो। ग्राम विकास की इस नवरचना का आधार है समाजशिल्पी दम्पत्ति, जो पांच वर्ष तक गांव में रहकर इस पांच सूत्रीय लक्ष्य की प्राप्ति के लिए काम करते हैं।

ग्रामोदय से राष्ट्रोदय के अभिनव प्रयोग के लिए नानाजी ने 1996 में स्नातक युवा दम्पत्तियों से पांच वर्ष का समय देने का आह्वान किया। पति-पत्नी दोनों कम से कम स्नातक हों, आयु 35 वर्ष से कम हो तथा दो से अधिक बच्चे न हों। इस आह्वान पर दूर-दूर के प्रदेशों से प्रतिवर्ष ऐसे दम्पत्ति चित्रकूट पहुंचने लगे। चयनित दम्पत्तियों को 15-20 दिन का प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षण के दौरान नानाजी का मार्गदर्शन मिलता है। नानाजी उनसे कहते हैं- "राजा की बेटी सीता उस समय की परिस्थितियों में इस क्षेत्र में 11 वर्ष तक रह सकती है, तो आज इतने प्रकार के संसाधनों के सहारे तुम पांच वर्ष क्यों नहीं रह सकतीं?" ये शब्द सुनकर नवदाम्पत्य में बंधी युवतियों में सेवा भाव और गहरा होता है तो कदम अपने सुनहरे शहर एवं घर की तरफ नहीं, सीता की तरह अपने पति के साथ जंगलों- पहाड़ों बीच बसे गांवों की ओर बढ़ते हैं। तब इनको नाम दिया जाता है- समाजशिल्पी दम्पत्ति। वर्तमान में 40 समाजशिल्पी दम्पत्ति यहां कार्यरत हैं।

अपनी मातृभूमि के गौरव और उसकी सेवा के लिए नानाजी ने पूरा जीवन होम कर दिया। उन्हें गाँवों की मिट्टी की सोंधी महक में सदा महसूस किया जाएगा। लोगों के हृदयों में उनका राज रहेगा। हमेशा आबाद उनका ग्रामीण समाज रहेगा। 
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प्राध्यापक, हिंदी विभाग, 
दिग्विजय कालेज, राजनांदगांव 
मो. 93010 54300 

Sunday, March 5, 2017

एकात्म मानववाद की प्रासंगिकता

एकात्म मानववाद की प्रासंगिकता

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

भारत की आजादी के समय विश्व दो ध्रुवी विचारों में बंटा था पूंजीवाद और साम्यवाद। यद्यपि हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के जन-नायकों का इस विषय पर मत था कि भारत अपने पुरातन जीवन-मूल्यों से युक्त रास्ते पर चले। परंतु इसे विडंबना  हैं कि देश ऊपर लिखे दोनों विचारों के व्यामोह में फंस कर घड़ी के पेंडुलम की तरह झूलता रहा। आजादी के बाद ही प्रसिध्द चिंतक, राजनीतिज्ञ एवं समाजसेवक पं. दीनदयाल उपाध्याय ने इन दोनों विचाराें,पूंजीवाद एवं साम्यवाद के विकल्प के रूप में एकात्म मानववाद का दर्शन रखा था।उन्होंने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर जोर दिया।अब जब कि साम्यवाद ध्वस्त हो चुका है, पूंजीवाद को विखरते-टूटते हम देख ही रहे हैं, भारत एवं विश्व के समक्ष इस दर्शन की प्रासंगिकता पर नए सिरे से विचार का समय आ गया है। 

विश्व ग्राम की अजब विडम्बना 
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आज सर्वविदित है कि संचार एवं सम्पर्क की दृष्टि से विश्व एक ग्राम बनता जा रहा है, वहीं, दूसरी ओर व्यक्ति का व्यवहार एवं कार्य स्वकेन्द्रित होते जा रहे हैं. सुख की खोज में अधिक से अधिक भौतिक साधनों की प्राप्ति ही मनुष्य के जीवन का उद्देश्य बन गया है. परिणाम स्वरूप मनुष्य के व्यक्तित्व, समाज तथा सम्पूर्ण विश्व में आन्तरिक विरोधाभास दिखलाई पड़ रहा है. हमारे प्राचीन चिंतकों ने मनुष्य के आन्तरिक व्यक्तित्व के पहलुओं तथा व्यक्ति समाज एवं सृष्टि के बीच गूढ़ सम्बन्धों पर गहन चिन्तन किया. इन विचारों के आधार पर पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद के दर्शन का प्रतिपादन किया. अर्थ के एकांगी मोह में व्यर्थ हो रहे मानव जीवन को उन्होंने सही माने में समर्थ बनाने का मार्गदर्शन किया। 

आर्थिक जीवन के तीन लक्ष्य 
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पंडित दीनदयाल जी ने एक ऐसे आर्थिक विकास के प्रारूप की बात कही जो व्यक्ति के आन्तरिक व्यक्तित्व एवं परिवार, समाज तथा सृष्टि के साथ  सम्बन्धों में कोई संघर्ष उत्पन्न न करे. हमारे शास्त्रों में धर्म के साथ अर्थ को जोड़कर कामनाओं के पूर्ति की बात कही गई है, जिसका अन्तिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है. किन्तु अर्थ यानि पैसा आज जीवन का आवश्यक आधार नहीं अपितु सम्पूर्ण जीवन का लक्ष्य बन गया है. पं. दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार आर्थिक विकास के तीन लक्ष्य हैं. हमारी आर्थिक योजनाओं का प्रथम लक्ष्य राजनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा का सामर्थ्य उत्पन्न करना, दूसरा लक्ष्य प्रजातंत्रीय पद्धति के मार्ग में बाधक न होना और तीसरा हमारे जीवन के कुछ सांस्कृतिक मूल्य जो राष्ट्रीय जीवन के कारण, परिणाम और सूचक हैं तथा विश्व के लिये भी उपादेय हैं, उनकी रक्षा करना होना चाहिये. यदि उन्हें गवांकर कर हमने अर्थ कमाया तो वह अनर्थकारी और निरर्थक होगा. 

अधिकार का जनक है कर्तव्य 
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उल्लेखनीय है कि एकात्म मानवतावाद व्यक्ति के विभिन्न रूपों और समाज की अनेक संस्थाओं में स्थायी संघर्ष या हित विरोध नहीं मानता। यदि यह कहीं दीखता है तो वह विकृति का प्रतीक  है। वर्ग संघर्ष की कल्पना ही धोखा है। राष्ट्र के निर्माण व्यक्तियों या संस्थाओं में संघर्ष हो तो यज्ञ चलेगा कैसे? वर्ग की कल्पना ही संघर्ष की जन्मदात्री है। हम मानते हैं कि समानता न होते हुए भी एकात्मता हो सकती है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का बाल्यकाल बेहद कष्टों में गुजरा. बहुत छोटी सी उम्र में पिता का साया सिर से उठ गया था. अपने प्रयासों से उन्होंने शिक्षा-दीक्षा हासिल की. बाद के समय में भारतीय विचारों से ओतप्रेत नेताओं का साथ मिला. यहीं से उनके जीवन में बदलाव आया लेकिन जो कष्ट उन्होंने बचपन में उठाये थे, उन कष्टों के चलते वे पूरी जिंदगी सादगी से जीते रहे. विद्यार्थियों के प्रति उनका विशेष अनुराग था. वे चाहते थे कि समाज में शिक्षा का अधिकाधिक प्रसार हो ताकि लोग अधिकारों के साथ कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो सकें. उन्हें इस बात का रंज रहता था कि समाज में लोग अधिकारों के प्रति तो चौंकन्ने हैं लेकिन कर्तव्य पूर्ति की भावना नगण्य हैं. उनका मानना था कि कर्तव्यपूर्ति के साथ ही अधिकार स्वयं ही मिल जाता है. 

एकात्म मानववाद का सार 
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पंडित दीनदयाल उपाध्याय का मानना था कि भारतवर्ष विश्व में सर्वप्रथम रहेगा तो अपनी सांस्कृतिक संस्कारों के कारण. उनके द्वारा स्थापित एकात्म मानववाद की परिभाषा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ज्यादा सामयिक है. उन्होंने कहा था कि मनुष्य का शरीर,मन, बुद्धि और आत्मा ये चारों अंग ठीक रहेंगे तभी मनुष्य को चरम सुख और वैभव की प्राप्ति हो सकती है. जब किसी मनुष्य के शरीर के किसी अंग में कांटा चुभता है तो मन को कष्ट होता है , बुद्धि हाथ को निर्देशित करती है कि तब हाथ चुभे हुए स्थान पर पल भर में पहुँच जाता है और कांटें को निकालने की चेष्टा करता है. यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. सामान्यत: मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा इन चारों की चिंता करता है. मानव की इसी स्वाभाविक प्रवृति को पं. दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद की संज्ञा दी. 

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की दृष्टि को समझना और भी जरूरी हो जाता है. वे कहते हैं कि विश्व को भी यदि हम कुछ सिखा सकते हैं तो उसे अपनी सांस्कृतिक सहिष्णुता एवं कर्तव्य-प्रधान जीवन की भावना की ही शिक्षा दे सकते हैं। अर्थ, काम और मोक्ष के विपरीत धर्म की प्रमुख भावना ने भोग के स्थान पर त्याग, अधिकार के स्थान पर कर्तव्य तथा संकुचित असहिष्णुता के स्थान पर विशाल एकात्मता प्रकट की है। पंडित जी का विश्वास अडिग है कि इनके साथ ही हम विश्व में गौरव के साथ खड़े हो सकते हैं। 
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हिन्दी विभाग, दिग्विजय कालेज,
राजनांदगांव, मो.9301054300 

Friday, January 13, 2017

इंसान को नींद से जगा देता है दुख का पहाड़ !

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

अभी के दौर में आर्थिक शब्दावली कुछ ज्यादा ही चलन में है, लिहाजा जीवन मूल्यों को भी आयात-निर्यात की नजर से देखा जाने लगा है। लेकिन भारत ने अपने मूल्य न तो अभी तक किसी पर थोपे हैं, न ही उनका निर्यात किया है। इनमें से जो भी दुनिया को अपने काम का लगता है, उसे वह ग्रहण करती है, ठीक वैसे ही, जैसे अन्य समाजों से हम ग्रहण करते हैं। जिस दौर में दुनिया अहिंसा को एक भारतीय मूल्य के रूप में अनुकरणीय मानती थी, भारत की धरती पर उस दौर में संसार का सबसे बड़ा साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन अहिंसा के सिद्धांत पर ही संचालित हो रहा था।

राम मनोहर लोहिया ने उस समय आइंस्टाइन से अपनी बातचीत के दौरान अहिंसा को एटॉमिक पॉवर से भी ज्यादा शक्तिशाली और संभावनामय बताया था और उनकी इस प्रस्थापना पर आइंस्टाइन ने हामी भी भरी थी। बाद में अहिंसा का ऐसा ही प्रयोग साउथ अफ्रीका में रंगभेदी व्यवस्था से मुक्ति के लिए दोहराया गया, लिहाजा यह मानना गलत होगा कि अहिंसा पर भारत का कॉपीराइट है। हां, इस महान मूल्य का रिश्ता अगर हमें दोबारा भारत से जोड़ना है तो किसी को हिम्मत करके एक बार फिर अहिंसा के बड़े राजनीतिक प्रयोग के रास्ते पर बढ़ना होगा।

दलाई लामा ने ठीक ही कहा है कि अहिंसा का निर्यात हम बहुत कर चुके, अब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत हमारे ही देश में है। बुद्ध के समय से हम अहिंसा का निर्यात करते आ रहे हैं। अशोक और गांधी के बाद नेहरू का पंचशील भी यही था। लेकिन हमारे यहां से बुद्ध और गांधी, दोनों ही विदा हो गए तो उनकी मान्यताएं कहां रहनी थीं। दरअसल बात यह है कि गांधी के जाने के बाद देश और राजनीति ने जो रास्ता पकड़ा, वह अहिंसा का नहीं रहा। स्वार्थ इतना बढ़ गया कि दूसरों की सुख-सुविधा के बारे में सोचने की इच्छा ही नहीं रही।

जब यही नहीं है तो अहिंसा का मूल, यानी दूसरों को दुख देना या दूसरों के अधिकार छीनना ही हिंसा है, यह कौन समझेगा। दूसरों के अधिकार छीनना हमें ही दुख पहुंचाएगा, जब तक हम यह नहीं समझेंगे तब तक न्याय नहीं कर सकते। गांधी ने हिंद स्वराज में ग्राम स्वतंत्रता की बात की थी, और कहा था कि बगैर उसके समानता नहीं आ सकती। लेकिन हुआ क्या? नेहरू ने गांधी को लिखा कि अंधियारे गांव देश को क्या प्रकाश देंगे? तब से हमारे देश में नेहरू की नीतियां चल रही हैं, गांधी की नहीं।

यही गलत हुआ। आज दुनिया के अनेक देशों में स्वायत्तता निचली इकाइयों तक पहुंची हुई है, लेकिन हमारे देश में इसका उलटा है। जब तक हम इस बारे में मूल रूप से सोचना शुरू नहीं करेंगे, तब तक देश में हिंसा होती रहेगी। हमें दूसरों के दुख के बारे में सोचना होगा। दलाई लामा यह कह सकते हैं क्योंकि वे वैसा ही जीवन जी रहे हैं। हमारे पास आयात करने के लिए तो बहुत कुछ है, लेकिन निर्यात करने के लिए अहिंसा के अलावा कुछ नहीं। लेकिन जो निर्यात करते हैं, उसे अपने लिए भी तो उपयोगी मानें। 

राजकुमार सिद्धार्थ अपने महल से निकले थे खुशी की तलाश में और रास्ते में उन्होंने बूढ़े, बीमार और मुर्दे को देखा। ये दुख के ही रूप हैं। गम कुछ इसी तरह से राजकुमार सिद्धार्थ की राह में खड़े थे। फिर क्या था? उन्होंने महल और रथ को छोड़कर दुख दूर करने का उपाय ढूंढने निकल पड़े। महात्मा बुद्ध की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि किसी के दुख को देखकर दुखी होने से अच्छा है, उसके दुख को दूर करने के लिए उसे तैयार करना।

दुख मन में होता है और कष्ट शरीर में। महात्मा बुद्ध का यह यूनिवर्सल विजन है कि सारे संसार में सबका दुख सदा-सदा के लिए कैसे दूर हो? निराला की कविता की एक लाइन है- 'दुख ही जीवन की कथा रही।' यह सच है कि दुख ही जीवन की कथा और परेशानी है। मगर इस परेशानी का अंत कैसे होगा? यही शिक्षा महात्मा बुद्ध ने दी है। राजकुमार सिद्धार्थ रथ पर सवार होकर महल से निकले, रास्ते में बूढ़े को देखा और झटका लगा कि वह भी बूढ़े होंगे। फिर उन्होंने बीमार को देखा, फिर उन्हें झटका लगा, उन्हें लगा कि वह भी बीमार पड़ेंगे। फिर उन्होंने मुर्दे को देखा और वे उन्हें जोर से झटका लगा कि वह भी मरेंगे। उन्होंने दुख को देखा और दुख के झटके से उनकी आंखें खुल गईं। दुख ने उनको जगा दिया।

इंसान चलते-फिरते, बोलते, काम करते हुए भी एक गहरी नींद में डूबा रहता है। दुख का पहाड़ इंसान को नींद से जगा देता है। दुख जगाता है। यही दुख का प्रभाव है। यही उसकी प्रासंगिकता भी है। हर दुख और पीड़ा एक संदेश देती है। जीवन जीने का संदेश। हर दुख एक चिट्ठी है। हर पीड़ा एक संदेश है। मगर हमारी आंखों पर अज्ञान का पर्दा पड़ा हुआ है, इसलिए उस संदेश को हम पढ़ नहीं पाते हैं। हम न खुद को जानते हैं और न भविष्य को। हम दुख को भोगते हैं। खुद का कोसते हैं। दूसरों को दोष देते हैं। यहां तक कि भगवान को भी दोष देते हैं। 

हिंदी फिल्मों के मंदिर में भगवान को दोष देते हुए कई सीन आपने देखे होंगे और ऐसे सीन आगे भी दिखाए जाएंगे। मगर दुख से संदेश ग्रहण करने का चलन हमारे यहां है ही नहीं। दुख से संदेश तो कोई बुद्धिमान ही लेता है। महात्मा बुद्ध का एक मूल सवाल है। जीवन का सत्य क्या है? यह प्रश्न हमारी पीड़ा से जुड़ा है। भविष्य को हम जानते नहीं है। अतीत पर या तो हम गर्व करते हैं या उसे याद करके पछताते हैं। भविष्य की चिंता में डूबे रहते हैं। दोनों दुखदायी है।

महात्मा बुद्ध ने वर्तमान का सदुपयोग करने की शिक्षा दी है। बुद्ध ने अतीत के खंडहरों और भविष्य के हवा महल से निकाल कर मनुष्य को वर्तमान में खड़ा रहने की शिक्षा दी है। बौद्ध दर्शन की रेल दया और बुद्धि की पटरी पर दौड़ती है। दया माने सबके लिए कल्याण की भावना। बिहार के बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे महात्मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई। उनके ज्ञान की रोशनी पूरी दुनिया में फैली। चीन की कहावत है- बांस के जंगल में बैठो और निश्चिंत होकर चाय पीओ। जैसे कि चीन के प्राचीन साधु-संत किया करते थे। यानी कि जीवन की परेशानियों के बीच शांत होकर बैठना। यह ताओवाद है।

पल भर ही सही अगरअतीत के खंडहर और भविष्य के हवा महल से मुक्त जा सके तो महावीर और बुद्ध की सीख का सार कुछ तो हमारे हिस्से आएगा। आएगा, जरूर आएगा। 
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प्राध्यापक,हिन्दी विभाग,शासकीय 
दिग्विजय महाविद्यालय, राजनांदगांव  नींद से जगा देता